नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस (NDPS) अधिनियम के तहत दर्ज करीब 4,747 मामलों के लंबित होने को लेकर चिंता जताते हुए 43 वकीलों ने बॉम्बे हाईकोर्ट को पत्र लिखकर ड्रग्स की तस्करी और सेवन से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों की संख्या बढ़ाने की मांग की है। इनमें एक मामला 1989 से लंबित है।
इस महीने की शुरुआत में वकीलों ने हाईकोर्ट के गार्जियन जज जस्टिस एम.एस. कर्णिक और जस्टिस नीला गोखले को पत्र सौंपकर विशेष अदालतों की संख्या मौजूदा चार से बढ़ाकर आठ करने की मांग की।
वकीलों के अनुसार वर्तमान में NDPS मामलों के लिए चार विशेष अदालतें हैं, जिनमें से एक अदालत पिछले दो महीनों से खाली है। इन अदालतों के सामने करीब 4,747 मामले लंबित हैं, जबकि केवल 509 मामलों में सुनवाई चल रही है।
पत्र के मुताबिक अदालतें हर महीने अधिकतम दो मामलों का निपटारा कर पा रही हैं, क्योंकि उन्हें बड़ी संख्या में लंबित मामलों और हिरासत से जुड़े मामलों के साथ-साथ जमानत याचिकाओं, रिमांड आवेदनों और अन्य विविध अर्जियों पर भी सुनवाई करनी पड़ती है। प्रत्येक अदालत के सामने प्रतिदिन करीब 60 मामले सूचीबद्ध होते हैं।
मुश्किलें इसलिए भी बढ़ रही हैं क्योंकि नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB), डायरेक्टोरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस (DRI), कस्टम्स, मुंबई पुलिस की एंटी-नारकोटिक्स सेल (ANC) और स्थानीय पुलिस थानों जैसी एजेंसियां हर सप्ताह औसतन 15 से 16 नए मामले दर्ज करती हैं।
वकीलों ने कहा कि कई मामलों में आरोपी मुकदमे की सुनवाई शुरू होने से पहले ही तीन साल से अधिक समय तक हिरासत में रहते हैं। इनमें बड़ी संख्या महिलाओं की भी है। मुकदमों में लंबा समय लगने का एक कारण गवाहों की बड़ी संख्या भी है। आमतौर पर किसी मामले में 15 से 40 गवाह होते हैं, जबकि कुछ मामलों में 100 से अधिक गवाहों का उल्लेख किया गया है।
एक वरिष्ठ सरकारी वकील के अनुसार जमानत पर बाहर मौजूद आरोपियों से जुड़े मामलों में देरी होती है, क्योंकि हिरासत में मौजूद आरोपियों के मामलों को प्राथमिकता दी जाती है। कई मामलों में जब सुनवाई का समय आता है, तब तक आरोपी फरार भी हो जाते हैं, जिससे देरी और बढ़ जाती है।
सरकारी वकील ने कहा, “इस देरी से न्यायिक व्यवस्था पर और दबाव पड़ता है, क्योंकि गवाहों और सबूतों को तलाशना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा रिकॉर्ड भी गुम हो जाते हैं और समय बीतने के साथ जब्त की गई नशीली सामग्री की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है। इन सभी कारणों से एजेंसियों को अदालत में अपना मामला हारना पड़ता है।” उन्होंने अधिक अदालतों और बेहतर बुनियादी ढांचे की आवश्यकता पर जोर दिया।
वकील अयाज खान, जो इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में शामिल हैं, ने कहा कि मौजूदा जज मामलों का जल्द से जल्द निपटारा करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन मामलों की भारी संख्या के कारण वे सुनवाई पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पा रहे हैं।
अयाज खान ने कहा- भारी काम के बोझ के कारण मामलों की सुनवाई पीछे छूट जाती है, जिससे और देरी होती है। जज मामलों की गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते, क्योंकि उन्हें समयबद्ध तरीके से तय किए जाने वाले कई आवेदन भी निपटाने होते हैं।
